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📝 आलोक कुमार की मौत पर उबाल पर देवघर | कैंडल मार्च में फूटा जनआक्रोश
🧾 देवघर में आलोक कुमार की संदिग्ध मौत को लेकर जनता सड़कों पर उतरी। वीआईपी चौक से घटनास्थल तक विशाल कैंडल मार्च, प्रशासन को खुली चेतावनी—अब सिर्फ इंसाफ चाहिए।
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आलोक कुमार की मौत पर उबाल पर देवघर, कैंडल मार्च में फूटा जनआक्रोश
वीआईपी चौक से घटनास्थल तक जनता का सख्त मौन, प्रशासन से सीधे जवाब की मांग
देवघर। भाजपा नेता आशुतोष कुमार के भाई आलोक कुमार की संदिग्ध और दर्दनाक मौत अब सिर्फ एक खबर नहीं रही। यह मामला देवघर की कानून व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और न्याय व्यवस्था की कड़ी परीक्षा बन चुका है। घटना के बाद से शहर में गुस्सा सुलग रहा था, जो रविवार को सड़कों पर खुलकर फूट पड़ा।
मृत आत्मा की शांति और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग को लेकर देवघर में एक विशाल कैंडल मार्च निकाला गया। यह मार्च केवल शोक नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ जनता का सीधा आरोपपत्र था।
जलती मोमबत्तियां, खामोश होंठ और सिस्टम से तीखा सवाल
कैंडल मार्च की शुरुआत वीआईपी चौक से हुई। इसके बाद यह मार्च टावर चौक, बाजला चौक होते हुए सीधे मॉडर्न पब्लिक स्कूल—यानी घटनास्थल—तक पहुंचा। सैकड़ों लोग हाथों में मोमबत्तियां लिए, बिना नारे लगाए, बिना शोर किए, सिर्फ एक संदेश के साथ चलते रहे—
“अब बहुत हो चुका, अब इंसाफ चाहिए।”
यह मौन किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि आक्रोश का प्रतीक था। लोगों का कहना था कि यह खामोशी दरअसल प्रशासन के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
“देवघर कोई अपराधियों की शरणस्थली नहीं”
कैंडल मार्च में शामिल लोगों ने दो टूक शब्दों में कहा कि देवघर देवाधिदेव महादेव की नगरी है, न कि अपराधियों की सुरक्षित पनाहगाह। यहां इस तरह की घटनाएं न सिर्फ कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती हैं, बल्कि पूरे शहर की पहचान को कलंकित करती हैं।
वक्ताओं ने कहा कि आलोक कुमार की मौत देवघर के इतिहास पर एक काला अध्याय है। अगर आज चुप्पी साध ली गई, तो कल कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
प्रशासन को खुली चेतावनी—अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए
जनता ने प्रशासन को साफ शब्दों में चेताया कि अब जांच के नाम पर लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लोगों ने कहा कि यदि इस मामले में त्वरित, निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह आंदोलन और व्यापक होगा।
जनता का स्पष्ट कहना था—
“हमें भाषण नहीं, परिणाम चाहिए। दोषी चाहे जो हो, उसे सजा मिलनी चाहिए।”
देवघर नहीं, इंसाफ के लिए जुटे कई जिलों के लोग
यह कैंडल मार्च सिर्फ स्थानीय विरोध नहीं था। इसमें देवघर के अलावा अन्य जिलों से आए लोग भी शामिल हुए। हर चेहरा यही कह रहा था कि यह लड़ाई किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है।
लोगों ने कहा कि अगर आज आलोक कुमार को इंसाफ नहीं मिला, तो यह हर आम नागरिक की हार होगी।

सैकड़ों नाम, एक ही नारा—दोषियों को सजा दो
कैंडल मार्च में प्रभाकर शांडिल्य, रूपेश सिंह, उमाशंकर सिंह, विजय प्रताप सनातन, अभिजीत सिंह, अभिषेक मिश्रा, सुमन यादव, सुनील गुप्ता, दीपक झा, राजेश यादव, विनय चंद्रवंशी, कुणाल सिंह, शुभम राय, कन्हैया सिंह, मधुकर चौधरी, अजीत नारायण देव, निलेश सिंह, पप्पू सिंह, मयंक राय, आकाश सिंह, अभिमन्यु सिंह, कांग्रेस दास, रिशु सिंह, मनोज सोरेन, भवेश भूषण, अंजन कुमार, सूरज राज, अनमोल राय, अभिषेक राय, कुणाल राय, सुजीत कुमार, जयंत राय, सरोज राय, दिलखुश चौधरी, अनमोल कुमार, राज किशोर, साकेत कुमार, अनिल महथा, बिल्लू झा, उत्तम शाही, विशाल विक्टर, नीलू राय, चंदन भैया, मंटू चौधरी, उत्तम राय, सिंटू राय, विनय राय, गौरव राज, सूरज चौधरी, अशोक सिंह, धीरेंद्र चौधरी, रूपेश राय, मिथिलेश कुमार, श्याम किशोर राय, विकास सिंह, गुंजन राय सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
नाम अलग-अलग थे, लेकिन आवाज एक—
“आलोक कुमार को इंसाफ दो।”
मौन के साथ खत्म हुआ मार्च, लेकिन सवाल अब भी जिंदा
घटनास्थल पर पहुंचकर सभी ने मृत आत्मा की शांति के लिए मौन रखा। लेकिन यह मौन किसी समझौते का नहीं था। लोगों ने साफ कहा कि यह चुप्पी अंत नहीं, शुरुआत है।
कैंडल मार्च भले समाप्त हो गया, लेकिन देवघर की फिजा में अब भी एक सवाल गूंज रहा है—
“आखिर दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?”
मोमबत्तियां बुझ गईं, मगर इंसाफ की आग अब और तेज जल रही है।










