
स्वतंत्रता संग्राम की सजीव स्मृतियों का अंत
111 वर्ष की आयु में परमेश्वरी देव्या का निधन, दासडीह गांव ने खोया इतिहास का जीवंत अध्याय
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111 वर्ष की आयु में परमेश्वरी देव्या का निधन | स्वतंत्रता सेनानी शंकर राय की धर्मपत्नी
देवघर के दासडीह गांव में स्वतंत्रता सेनानी शंकर राय की धर्मपत्नी परमेश्वरी देव्या का 111 वर्ष की आयु में निधन। पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख ने दी श्रद्धांजलि, आज़ादी की संघर्ष गाथाओं को किया याद।
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“ताम्रपत्र मिले या न मिले, इलाका जानता है शंकर राय का योगदान” — बादल पत्रलेख
नगदी राय, कंटु महरा राय, मंगरु महतो के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे थे शंकर राय
देवघर/संवाददाता।
देवघर जिले के सारवां प्रखंड अंतर्गत दासडीह गांव में गुरुवार को स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों से जुड़ा एक सजीव अध्याय शांत हो गया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय शंकर राय की धर्मपत्नी परमेश्वरी देव्या का 111 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे गांव सहित आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई। बड़ी संख्या में ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य लोग उनके आवास पर पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित करते नजर आए।
परमेश्वरी देव्या केवल एक परिवार की वरिष्ठ सदस्य नहीं थीं, बल्कि वे उस दौर की साक्षी थीं, जब आज़ादी के लिए संघर्ष जीवन का हिस्सा हुआ करता था। उन्होंने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन की पीड़ा को देखा, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से उसे पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों तक पहुंचाया।
दासडीह गांव पहुंचकर बादल पत्रलेख ने अर्पित की श्रद्धांजलि
गुरुवार को झारखंड के पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख दासडीह गांव पहुंचे और स्वर्गीय परमेश्वरी देव्या को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने परिजनों से मुलाकात कर इस दुख की घड़ी में संवेदना व्यक्त की और कहा कि परमेश्वरी देव्या का दीर्घ जीवन स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का अमूल्य दस्तावेज रहा है।
श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बादल पत्रलेख ने कहा कि आज जब हम आज़ादी के अमृत काल की बात करते हैं, तब ऐसे परिवारों और ऐसे त्याग की कहानियों को याद करना और भी जरूरी हो जाता है। उन्होंने कहा कि दासडीह और आसपास के क्षेत्रों में आज भी स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा होती है तो शंकर राय का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन की गाथाएं जो आज भी जीवित हैं
अपने शोक वक्तव्य में बादल पत्रलेख ने कहा कि पुराने स्वतंत्रता सेनानियों नगदी राय, कंटु महरा और मंगरु महतो से यह बातें सुनी जाती रही हैं कि किस प्रकार शंकर राय ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने बताया कि कई स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया, लेकिन दुर्भाग्य या अज्ञानवश शंकर राय का नाम उस सूची में शामिल नहीं हो सका।
उन्होंने भावुक स्वर में कहा,
“ताम्रपत्र मिले या न मिले, इलाका जानता है कि शंकर राय ने आज़ादी की लड़ाई में कितनी बड़ी भूमिका निभाई।”
पूर्व मंत्री ने कहा कि उस दौर में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई लोगों को थानों में डिटेन किया गया था और शंकर राय भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने बताया कि आंदोलन की वे कठिन कहानियां उनकी धर्मपत्नी परमेश्वरी देव्या स्वयं सुनाया करती थीं।
अकाल, संघर्ष और साहस की कहानी
परमेश्वरी देव्या बताया करती थीं कि किस तरह आंदोलन के दिनों में लोगों को छुप-छुपकर रहना पड़ता था। जब घुड़सवार अंग्रेजी सेना गांव में प्रवेश करती थी, तो आंदोलनकारियों और ग्रामीणों को जान बचाने के लिए जंगलों और खेतों में शरण लेनी पड़ती थी।
उन्होंने यह भी बताया कि अकाल के समय जीवन कितना कठिन था। कई बार पीपल, सखुआ और बर्बरी जैसे जंगली फलों को खाकर ही परिवार और आंदोलनकारियों ने जीवन गुजारा। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्वतंत्रता की लौ बुझने नहीं दी गई।
93 वर्षीय भाई वकील बाबू ने साझा किए संस्मरण
इस अवसर पर स्वर्गीय शंकर राय के 93 वर्षीय भाई वकील बाबू ने भी अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा कि शंकर राय ने कई स्वतंत्रता आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और समाज को जागरूक करने में हमेशा अग्रणी रहे।
उन्होंने कहा कि शंकर राय केवल एक आंदोलनकारी नहीं थे, बल्कि वे समाज को दिशा देने वाले व्यक्तित्व थे। परिवार की यह इच्छा है कि आज भी शंकर राय का नाम समाज सेवा और स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों के साथ जीवित रहे, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष और त्याग से प्रेरणा ले सकें।
गांव और समाज के लिए अपूरणीय क्षति
परमेश्वरी देव्या के निधन को गांव और समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताया जा रहा है। श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित लोगों ने कहा कि उनका जीवन आज़ादी की लड़ाई का मौन दस्तावेज था। वे जब भी उस दौर की बातें साझा करती थीं, तो सुनने वालों की आंखें नम हो जाती थीं।
मौके पर परिवार के सदाशिव ग्रामीण सहित कई ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि परमेश्वरी देव्या का दीर्घ और संघर्षपूर्ण जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
स्मृतियों में जीवित रहेंगी आज़ादी की कहानियां
111 वर्षों का यह जीवन केवल उम्र का आंकड़ा नहीं था, बल्कि उसमें देश की आज़ादी की पूरी गाथा समाई हुई थी। परमेश्वरी देव्या के निधन के साथ एक युग भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उनके द्वारा सुनाई गई स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियां दासडीह गांव और पूरे क्षेत्र में सदैव जीवित रहेंगी।
उनका जीवन और शंकर राय का संघर्ष यह संदेश देता है कि आज़ादी केवल इतिहास की किताबों में दर्ज घटना नहीं, बल्कि असंख्य गुमनाम नायकों और उनके परिवारों के त्याग का परिणाम है।









