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देवघर के प्रख्यात विद्वान डॉ. मोहनानंद मिश्र का निधन, साहित्य और शिक्षा जगत में शोक
श्री बैद्यनाथ वांग्मय ग्रंथ के रचयिता, बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य और हिंदी विद्यापीठ के पूर्व कुलपति डॉ. मोहनानंद मिश्र का 89 वर्ष की आयु में निधन। देवघर सहित पूरे साहित्यिक और शैक्षणिक जगत में शोक की लहर।
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देवघर ने खोया ज्ञान का अनमोल स्तंभ: डॉ. मोहनानंद मिश्र का 89 वर्ष की आयु में निधन
श्री बैद्यनाथ वांग्मय ग्रंथ के रचयिता, संस्कृत और हिंदी जगत के प्रख्यात विद्वान को भावभीनी श्रद्धांजलि; शिक्षा और साहित्य जगत में शोक की लहर
सुनील झा | देवघर | 3 जुलाई 2026

डॉ. मोहनानंद मिश्र को श्रद्धांजलि अर्पित करते गणमान्य लोग।
प्रख्यात विद्वान डॉ. मोहनानंद मिश्र के निधन पर उनके आवास पर श्रद्धांजलि अर्पित करते विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोग।
देवघर की सांस्कृतिक, साहित्यिक और शैक्षणिक विरासत को गहरा आघात पहुंचा है। डॉ. मोहनानंद मिश्र का निधन शुक्रवार सुबह 89 वर्ष की आयु में बिलासी टाउन स्थित शीतल मल्लिक रोड आवास पर हो गया। उनके निधन से देवघर ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के शिक्षा, संस्कृत और हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
श्री बैद्यनाथ वांग्मय ग्रंथ के रचयिता, बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य तथा हिंदी विद्यापीठ के पूर्व कुलपति रहे डॉ. मोहनानंद मिश्र ने अपना संपूर्ण जीवन भारतीय संस्कृति, संस्कृत और हिंदी भाषा के संवर्धन के लिए समर्पित कर दिया। उनके निधन को देवघर के बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास की अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
संस्कृत, हिंदी और भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी थे डॉ. मोहनानंद मिश्र
डॉ. मोहनानंद मिश्र उन चुनिंदा विद्वानों में शामिल थे जिन्होंने शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि समाज निर्माण का सबसे प्रभावी साधन माना। उन्होंने वर्षों तक बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में विद्यार्थियों को संस्कार, ज्ञान और भारतीय परंपरा से जोड़ने का कार्य किया।
हिंदी विद्यापीठ के कुलपति के रूप में भी उन्होंने संस्थान को नई दिशा और पहचान दिलाई। उनके कार्यकाल में अनेक शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों को बढ़ावा मिला, जिससे विद्यार्थियों और शोधार्थियों को नई संभावनाएं मिलीं।
‘श्री बैद्यनाथ वांग्मय ग्रंथ’ बनी उनकी अमर पहचान
डॉ. मोहनानंद मिश्र की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धियों में ‘श्री बैद्यनाथ वांग्मय ग्रंथ’ का सृजन शामिल है। इस ग्रंथ को बाबा बैद्यनाथ धाम की सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।
धार्मिक साहित्य और स्थानीय इतिहास को संरक्षित करने में उनके योगदान को सदैव याद किया जाएगा। साहित्यकारों का मानना है कि उनकी यह कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए भी मार्गदर्शक बनी रहेगी।
श्रद्धांजलि देने उमड़े शहर के गणमान्य लोग
डॉ. मोहनानंद मिश्र के निधन की सूचना मिलते ही उनके आवास पर सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य लोग पहुंचे। सभी ने पुष्पांजलि अर्पित कर दिवंगत आत्मा को नमन किया तथा शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
मौके पर उपस्थित लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की और कहा कि डॉ. मिश्र का योगदान सदैव समाज को प्रेरित करता रहेगा।
बादल पत्रलेख बोले – आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे
पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ. मोहनानंद मिश्र का व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में उनका योगदान अमूल्य है। उनके द्वारा छोड़ी गई बौद्धिक विरासत को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनका निधन देवघर ही नहीं बल्कि पूरे राज्य की अपूरणीय क्षति है।
अशोकानंद झा ने बताया शिक्षा जगत की बड़ी क्षति
हिंदी विद्यापीठ के व्यवस्थापक अशोकानंद झा ने कहा कि डॉ. मोहनानंद मिश्र ने हिंदी विद्यापीठ को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे अनुशासनप्रिय, दूरदर्शी और उच्च कोटि के शिक्षाविद थे। उनके नेतृत्व में अनेक विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं।
उन्होंने कहा कि डॉ. मिश्र का जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि एक युग का अंत है।
राकेश नरौने ने कहा – देवघर ने अपना मनीषी खो दिया
केकेएन ग्रुप के अध्यक्ष राकेश नरौने ने कहा कि डॉ. मोहनानंद मिश्र केवल विद्वान नहीं थे, बल्कि समाज के लिए प्रेरणादायी व्यक्तित्व थे। उनका सादा जीवन, उच्च विचार और ज्ञान के प्रति समर्पण उन्हें विशिष्ट बनाता था।
उन्होंने कहा कि देवघर ने आज एक ऐसे मनीषी को खो दिया है जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
सांसद, विधायक और विभिन्न संगठनों ने जताया शोक
डॉ. मोहनानंद मिश्र के निधन पर सांसद निशिकांत दुबे, विधायक सुरेश पासवान, पूर्व विधायक नारायण दास, पंडा धर्मरक्षिणी सभा के अध्यक्ष प्रो. डॉ. सुरेश भारद्वाज, महामंत्री निर्मल झा ‘मंटू’ सहित अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक संगठनों के पदाधिकारियों ने गहरा शोक व्यक्त किया।
सभी ने कहा कि डॉ. मिश्र ने अपने ज्ञान और व्यक्तित्व से देवघर की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भरा-पूरा परिवार छोड़ गए डॉ. मिश्र
डॉ. मोहनानंद मिश्र अपने पीछे दो पुत्र विपिन मिश्रा एवं सचिन मिश्रा, नाती-पोतों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके निधन से परिवार के साथ-साथ उनके शिष्यों, सहयोगियों और शुभचिंतकों में गहरा शोक व्याप्त है।
जीवनभर शिक्षा और संस्कृति के संवाहक रहे
डॉ. मोहनानंद मिश्र का जीवन इस बात का उदाहरण है कि ज्ञान और संस्कार समाज को नई दिशा देने की सबसे बड़ी शक्ति हैं। उन्होंने शिक्षा को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य किया।
उनकी विद्वत्ता, विनम्रता और सरल व्यक्तित्व ने उन्हें समाज के हर वर्ग में सम्मान दिलाया। वे केवल एक शिक्षक या साहित्यकार नहीं, बल्कि देवघर की सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण स्तंभ थे।
निष्कर्ष
डॉ. मोहनानंद मिश्र का निधन देवघर के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। उन्होंने अपने ज्ञान, लेखन, शिक्षण और सांस्कृतिक योगदान से जो विरासत छोड़ी है, वह आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। उनका जीवन शिक्षा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
Q1. डॉ. मोहनानंद मिश्र का निधन कब हुआ?
उत्तर: उनका निधन 3 जुलाई 2026 की सुबह 89 वर्ष की आयु में देवघर स्थित उनके आवास पर हुआ।
Q2. डॉ. मोहनानंद मिश्र की प्रमुख उपलब्धि क्या थी?
उत्तर: वे श्री बैद्यनाथ वांग्मय ग्रंथ के रचयिता, बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य तथा हिंदी विद्यापीठ के पूर्व कुलपति रहे।
Q3. उनके निधन पर किन लोगों ने शोक व्यक्त किया?
उत्तर: पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख, सांसद निशिकांत दुबे, विधायक सुरेश पासवान, पूर्व विधायक नारायण दास, अशोकानंद झा, राकेश नरौने, प्रो. डॉ. सुरेश भारद्वाज, निर्मल झा ‘मंटू’ सहित अनेक सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक हस्तियों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
Q4. डॉ. मोहनानंद मिश्र की विरासत क्या है?
उत्तर: शिक्षा, संस्कृत, हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उनका योगदान उनकी सबसे बड़ी विरासत मानी जाती है।









