
विशेष रिपोर्ट
ओमान से सात दिनों बाद गांव लौटा कुर्बान का पार्थिव शरीर, मंझलीटीकर में फूट-फूट कर रोया हर इंसान
दर्शन के लिए उमड़ी भीड़, मां-बाप की चीत्कार से कांप उठा पूरा गांव
बादल पत्रलेख बोले— विदेश में मेहनत कर रहे मजदूरों की पीड़ा देश की पीड़ा है
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ओमान में काम के दौरान मौत का शिकार हुए मंझलीटीकर गांव के युवक कुर्बान का पार्थिव शरीर सात दिन बाद गांव पहुंचा। अंतिम दर्शन के दौरान पूरे गांव में कोहराम मच गया। पूर्व मंत्री बादल पत्रलेख ने परिवार को हर संभव मदद का भरोसा दिया।
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देवघर / सुनील झा।

झारखंड के देवघर जिले के मंझलीटीकर गांव का रहने वाला युवक कुर्बान, जो रोज़गार के लिए ओमान गया था, उसकी विदेश में असामयिक मौत हो गई। सात दिनों की लंबी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद जब उसका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, तो पूरे इलाके में कोहराम मच गया। गांव का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति बचा हो, जिसकी आंखें नम न हुई हों।
कब हुआ? (When Happened)
परिजनों के अनुसार, 11 जनवरी को ओमान के मास्कट शहर में काम के दौरान कुर्बान की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उसी दिन उसकी मौत हो गई। इसके बाद शव को भारत लाने की प्रक्रिया में लगभग सात दिन लग गए।
शनिवार को जब शव कोलकाता एयरपोर्ट होते हुए गांव पहुंचा, तब यह दुखद इंतजार खत्म हुआ।
कैसे हुआ? (How It Happened)
कुर्बान ओमान की एक पॉलीमर कंपनी में काम करता था। बताया जाता है कि काम के दौरान उसे अचानक सीने में तेज दर्द हुआ। उस समय वह अपनी पत्नी से फोन पर बात कर रहा था। उसने कहा—
“तबीयत ठीक नहीं लग रही, बाद में बात करेंगे…”
यही उसके जीवन के आखिरी शब्द साबित हुए।
इसके बाद उसने चेन्नई में रह रहे अपने एक इंजीनियर साथी को फोन कर तबीयत खराब होने की जानकारी दी। जब साथी उसके कमरे पर पहुंचा, तो कुर्बान बेड के नीचे गिरा हुआ मिला।
उसे तुरंत अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन रास्ते में ही उसकी सांसें थम गईं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हृदय गति रुकना मौत का कारण बताया जा रहा है।
गांव में मातम, अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब
जैसे ही कुर्बान का पार्थिव शरीर मंझलीटीकर गांव में पहुंचा, मां की करुण चीत्कार, पिता की सूनी आंखें और पत्नी की बेहोशी ने हर किसी का कलेजा चीर दिया।
गांव की गलियों में सन्नाटा था, लेकिन हर आंगन से रोने की आवाजें आ रही थीं।
केवल मंझलीटीकर ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों और देवघर जिले के विभिन्न इलाकों से लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।
कोई उसकी सादगी को याद कर रहा था, तो कोई कह रहा था—
“इतना नेक लड़का, किस्मत ने बहुत जल्दी छीन लिया।”

परिवार की आर्थिक रीढ़ था कुर्बान
कुर्बान, मो. शोबराती मियां का छोटा बेटा था और पूरे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी।
वह अपने पीछे—
माता–पिता
पत्नी
चार बेटे
दो बेटियां
दो भाईयों
सहित भरा-पूरा को छोड़ गया है।
पिता ने रोते हुए बताया कि जब 11 जनवरी को ओमान से आधार कार्ड मंगाने की बात कही गई, तभी मन में अनहोनी की आशंका हो गई थी।
विदेश में मानवता बनी सहारा
कुर्बान विदेश में पूरी तरह अकेला था। वहां उसका कोई सगा-संबंधी नहीं था। ऐसे में तमिलनाडु और बिहार के प्रवासी मजदूरों ने मानवता की मिसाल पेश की।
कंपनी प्रबंधन ने पूरा सहयोग किया
ओमान प्रशासन ने कानूनी प्रक्रिया में मदद की
साथियों ने शव को भारत भेजने तक साथ नहीं छोड़ा
परिजनों का कहना है कि अगर वहां के लोग मदद नहीं करते, तो बेटे का शव गांव तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल होता।

बादल पत्रलेख का बयान बना उम्मीद की किरण
कुर्बान का पार्थिव शरीर गांव पहुंचते ही पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख स्वयं मंझलीटीकर पहुंचे।
उन्होंने शोक संतप्त परिवार से मिलकर ढांढस बंधाया और कहा—
“विदेश में मेहनत कर रहे मजदूर हमारे देश की रीढ़ हैं।
कुर्बान जैसे युवा अपने परिवार के भविष्य के लिए जान की बाजी लगाते हैं।
उनकी पीड़ा पूरे देश की पीड़ा है।”
उन्होंने मौके पर ही जिले के उपायुक्त नमन प्रियसे लकड़ा और सारवां प्रखंड विकास पदाधिकारी रजनीश कुमार से फोन पर बात कर परिवार को सहायता दिलाने का निर्देश दिया।
साथ ही कहा कि लेबर विभाग और संबंधित मंत्रालयों से बात कर सभी सरकारी सहायता दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
सल्तनत ऑफ ओमान और कंपनी का आभार
बादल पत्रलेख ने सल्तनत ऑफ ओमान और पॉलीमर कंपनी प्रबंधन का भी आभार जताया।
उन्होंने कहा कि विदेश में दिखाई गई यह संवेदनशीलता काबिले-तारीफ है और इससे पीड़ित परिवार को थोड़ी राहत मिलती है।
गांव में पसरा सन्नाटा, दुआओं में उठे हाथ
फिलहाल मंझलीटीकर गांव में हर तरफ सन्नाटा पसरा है।
हर घर में कुर्बान की चर्चा है, हर जुबान पर उसके लिए दुआ।
लोग कह रहे हैं—
“कुर्बान की कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उन हजारों प्रवासी मजदूरों की है, जो घर से दूर रहकर अपनों के लिए जीते हैं और कई बार खामोशी से इस दुनिया को अलविदा कह जाते हैं।”
निष्कर्ष (Conclusion)
कुर्बान की मौत सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि देश की उस सच्चाई का आईना है, जहां रोज़गार के लिए विदेश गए मजदूर असुरक्षित हालात में काम करने को मजबूर हैं।
उसका पार्थिव शरीर तो गांव लौट आया, लेकिन उसके सपने, उसकी मेहनत और उसके बच्चों का भविष्य आज भी सवाल बनकर खड़ा है।
अब देखना यह है कि सरकारी आश्वासन जमीन पर कितना उतरता है और कुर्बान के परिवार को वास्तव में कितना सहारा मिल पाता है।











