झारखंड आंदोलन की काकी मां बसंती देवी का निधन, सेवा और ममता की जीवित मिसाल का अवसान

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झारखंड आंदोलन की काकी मां बसंती देवी का निधन, सेवा और ममता की जीवित मिसाल का अवसान

 

झारखंड आंदोलन के कठिन दौर में आंदोलनकारियों की निस्वार्थ सेवा करने वाली काकी मां बसंती देवी का निधन। गुरुजी शिबू सोरेन से लेकर कई नेताओं की सेवा कर बनीं आंदोलन की ममता की प्रतीक।

 

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झारखंड आंदोलन की काकी मां बसंती देवी का निधन, सेवा और ममता की जीवित मिसाल का अवसान

झारखंड आंदोलन के कठिन दौर में आंदोलनकारियों की बनीं ममतामयी सहारा

श्यामडीह कोलियरी में रहकर गुरुजी से लेकर कई नेताओं की की निस्वार्थ सेवा

बादल पत्रलेख ने बताया आंदोलन की अनकही शक्ति, कमलेश्वरी प्रसाद झा को भी दी श्रद्धांजलि

देवघर/ सुनील झा।

झारखंड आंदोलन केवल नारों, सभाओं और संघर्षों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत गुमनाम चेहरों की गाथा भी है, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर आंदोलन को जीवित रखा। ऐसी ही एक ममतामयी स्तंभ थीं बसंती देवी उर्फ काकी मां, जिनका रविवार को हृदय गति रुकने से निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही सारवां प्रखंड, देवघर जिला और झारखंड आंदोलन से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई।

काकी मां केवल एक व्यक्ति नहीं थीं, वे एक भावना थीं—मां जैसी ममता, बहन जैसा अपनापन और साथी जैसी मजबूती। उनका जाना केवल एक परिवार की क्षति नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के इतिहास का एक मौन अध्याय बंद हो जाना है।

आंदोलन की रसोई से इतिहास की धड़कन तक

बसंती देवी, सारवां प्रखंड की नारंगी पंचायत अंतर्गत नारंगी गांव निवासी स्वर्गीय गणेश राय की धर्मपत्नी थीं। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर जीवन को केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज और आंदोलन को ही अपना परिवार बना लिया।

झारखंड आंदोलन के दौर में जब आंदोलनकारियों को सुरक्षित ठिकानों, भोजन और अपनापन की सबसे अधिक जरूरत थी, तब काकी मां का घर शरणस्थली बन गया। पश्चिम बंगाल के श्यामडीह कोलियरी क्षेत्र में रहते हुए उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक दिशुम गुरु शिबू सोरेन, पूर्व सांसद सूरज मंडल, वर्तमान विधायक मथुरा महतो सहित अनेक आंदोलनकारियों की सेवा की।

उनका आंगन रणनीति का केंद्र बनता, रसोई आंदोलन की ऊर्जा। कोई थका हुआ आता तो वे बिना कुछ पूछे पानी और शर्बत लेकर खड़ी हो जातीं। कोई देर रात तक बैठक में रहता तो चाय-नाश्ता खुद बनाकर परोसतीं। यही कारण था कि हर आंदोलनकारी उन्हें “काकी मां” कहकर पुकारता था।

 

सेवा को बनाया धर्म, सादगी को बनाया पहचान

काकी मां का जीवन सादगी और सेवा का प्रतीक था। उन्होंने कभी किसी पहचान, पद या सम्मान की अपेक्षा नहीं की। उनका मानना था कि यदि आंदोलन सफल होगा, तो उसमें उनकी सेवा अपने आप शामिल मानी जाएगी।

धार्मिक और सामाजिक कार्यों में भी वे हमेशा आगे रहीं। सारवां क्षेत्र में बजरंग बली मंदिर और दुर्गा मंदिर के निर्माण, देखरेख और पूजा-पाठ की व्यवस्था में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे हर त्योहार को सामूहिक उत्सव में बदल देती थीं।

उनका घर हर वर्ग, हर जाति और हर विचारधारा के लिए खुला रहता था। यही कारण था कि वे केवल एक गांव की नहीं, बल्कि पूरे आंदोलन की मां बन गईं।

 

 

अजय नदी तट पर नम आंखों से विदाई

रविवार को उनके निधन के बाद पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल रहा। उनका अंतिम संस्कार अजय नदी श्मशान घाट पर किया गया, जहां उनके पुत्र संतोष कुमार राय ने मुखाग्नि दी। अंतिम यात्रा में ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और झारखंड आंदोलन से जुड़े लोगों की भारी भीड़ उमड़ी।

हर किसी की आंखों में आंसू थे और जुबान पर एक ही बात—

“अब कोई काकी मां नहीं रही, जो बिना पूछे सबकी चिंता करे।”

 

बादल पत्रलेख ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख सूचना पाकर नारंगी गांव पहुंचे और काकी मां को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि झारखंड आंदोलन की सफलता में बसंती देवी जैसी महिलाओं की भूमिका को कभी शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।

उन्होंने कहा,

“काकी मां ने सेवा को ही अपना धर्म बनाया। वे आंदोलन की वह शक्ति थीं, जो कभी मंच पर नहीं दिखीं, लेकिन हर संघर्ष में मौजूद रहीं। उनका योगदान इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में दर्ज है।”

कमलेश्वरी प्रसाद झा को भी दी श्रद्धांजलि

इसी क्रम में पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख सारवां प्रखंड के दासडीह गांव निवासी स्वर्गीय कमलेश्वरी प्रसाद झा के निधन पर उनके आवास पहुंचे और उन्हें भी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने शोक संतप्त परिजनों से मुलाकात कर ढांढस बंधाया और कहा कि समाज को ऐसे सज्जनों की कमी हमेशा खलेगी।

 

समाज ने खोई आंदोलन की मां

काकी मां के निधन से समाज ने केवल एक महिला नहीं, बल्कि आंदोलन की मां, सेवा की मिसाल और ममता की छाया खो दी है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि बड़े बदलाव केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा करने वाले साधारण लोगों से आते हैं।

श्रद्धांजलि सभा में संतोष राय, झापु राय, प्रकाश राय, विनोद राय, मिहिर राय, पंकज झा, महेश्वर झा, विकास झा, रवि झा, बाबू झा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

काकी मां भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन झारखंड आंदोलन की हर कहानी में उनकी ममता, सेवा और त्याग हमेशा जीवित रहेगा।

 

Baba Wani
Author: Baba Wani

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