पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश कलमाडी का निधन, राजनीति, सेना और खेल प्रशासन में रहा प्रभावशाली योगदान

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पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश कलमाडी का निधन, राजनीति से खेल प्रशासन तक रहा लंबा सफर

 

पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुरेश कलमाडी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। पुणे में अंतिम संस्कार, राजनीति, सेना और खेल प्रशासन में निभाई अहम भूमिका।

 

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पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश कलमाडी का निधन, राजनीति, सेना और खेल प्रशासन में रहा प्रभावशाली योगदान

नई दिल्ली।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश कलमाडी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने पुणे के दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में अंतिम सांस ली, जहां वे बीते कुछ दिनों से उपचाराधीन थे। उनके निधन से राजनीतिक, खेल और प्रशासनिक जगत में शोक की लहर है।

परिवार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, कलमाडी के पार्थिव शरीर को दोपहर 2 बजे तक पुणे के एरंडवाने स्थित उनके आवास कलमाडी हाउस में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद दोपहर 3:30 बजे पुणे के नवी पेठ स्थित बैकुंठ श्मशान भूमि में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

 

राजनीति में लंबा और प्रभावशाली सफर

सुरेश कलमाडी कांग्रेस पार्टी के उन नेताओं में शामिल रहे, जिन्होंने संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वे नरसिम्हा राव सरकार के दौरान 1995-96 में केंद्रीय मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार में राज्य मंत्री के रूप में अपनी भूमिका निभाई और नीतिगत फैसलों में भागीदारी की।

उनकी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, कलमाडी ने केंद्रीय रेल राज्य मंत्री के रूप में रेल बजट प्रस्तुत किया था, जो उनके राजनीतिक करियर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है।

 

 

सेना से राजनीति तक का सफर

पुणे निवासी सुरेश कलमाडी का जीवन केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने 1960 के दशक की शुरुआत में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में प्रवेश लिया और बाद में भारतीय वायु सेना में पायलट के रूप में भर्ती हुए।

कलमाडी ने भारतीय वायु सेना में छह वर्षों तक सेवा दी। इसके बाद वे दो वर्षों तक एनडीए में प्रशिक्षक भी रहे। उनके सैन्य जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ हुए युद्धों में सक्रिय भागीदारी निभाई।

 

संजय गांधी के साथ राजनीति में प्रवेश

सुरेश कलमाडी को राजनीति में लाने का श्रेय संजय गांधी को दिया जाता है। बताया जाता है कि राजनीति में आने से पहले वे पुणे में फास्ट फूड आउटलेट का संचालन करते थे। संजय गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना।

कुछ समय तक उन्होंने महाराष्ट्र युवा कांग्रेस का नेतृत्व किया, जहां से उनकी पहचान एक संगठक और उभरते नेता के रूप में बनी।

 

 

राज्यसभा से लोकसभा और फिर केंद्र सरकार तक

राजनीतिक सफर में आगे बढ़ते हुए सुरेश कलमाडी 1982 में राज्यसभा के सदस्य बने। इसके बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में और मजबूत होते चले गए। पार्टी और सरकार में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती रही, जिसका परिणाम केंद्रीय मंत्री पद के रूप में सामने आया।

 

खेल प्रशासन में दबदबा

राजनीति के साथ-साथ सुरेश कलमाडी भारतीय खेल प्रशासन में भी एक प्रभावशाली नाम रहे। वर्ष 1996 में वे भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के अध्यक्ष बने। खास बात यह रही कि वे लगातार दो चार-वर्षीय कार्यकालों के लिए निर्विरोध चुने गए, जिससे खेल जगत में उनका दबदबा साफ झलकता है।

उनके कार्यकाल में भारत ने अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में अपनी भागीदारी और आयोजन क्षमता को लेकर नई पहचान बनाई।

 

 

कॉमनवेल्थ गेम्स और विवाद

हालांकि कलमाडी का करियर उपलब्धियों के साथ-साथ विवादों से भी जुड़ा रहा। कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन के दौरान सामने आए कथित घोटालों की आंच उन तक भी पहुंची। इस मामले में उन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे और सीबीआई ने उनके आवास पर छापा भी मारा था।

लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, पिछले वर्ष अदालत ने सबूतों के अभाव में उन्हें क्लीन चिट दे दी थी। इसके बावजूद यह विवाद उनके सार्वजनिक जीवन का सबसे चर्चित अध्याय माना जाता है।

 

निधन से राजनीतिक और खेल जगत में शोक

सुरेश कलमाडी के निधन पर कांग्रेस पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों और खेल संगठनों ने शोक व्यक्त किया है। नेताओं ने उन्हें एक अनुभवी राजनेता, पूर्व सैनिक और खेल प्रशासक के रूप में याद किया।

उनका जीवन राजनीति, राष्ट्रसेवा और खेल प्रशासन—तीनों क्षेत्रों में सक्रिय योगदान का उदाहरण रहा।

 

निष्कर्ष

सुरेश कलमाडी का निधन एक ऐसे व्यक्तित्व के अंत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने सेना से लेकर संसद और खेल संगठनों तक अपनी अलग पहचान बनाई। उपलब्धियों और विवादों से भरा उनका जीवन भारतीय सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा।

 

Baba Wani
Author: Baba Wani

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