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देवघर सदर अस्पताल में स्वास्थ्य कर्मियों ने केंद्र सरकार के चार श्रम कानूनों के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया। संघ ने कानून वापस लेने की मांग की।
चार श्रम कानून विरोध प्रदर्शन
भारत सरकार द्वारा लागू किए गए चार श्रम कानून के खिलाफ स्वास्थ्य कर्मियों ने किया प्रदर्शन
देवघर। संविधान दिवस के मौके पर जहां देशभर में संविधान की रक्षा का संकल्प लिया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर श्रमिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर विरोध की आवाज भी तेज हो गई। भारत सरकार द्वारा लागू किए गए चार नए श्रम कानूनों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन के तहत बुधवार को देवघर सदर अस्पताल परिसर में झारखंड चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ, देवघर शाखा ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस आंदोलन का नेतृत्व संघ के जिलाध्यक्ष मनोज कुमार मिश्र ने किया।
प्रदर्शन के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चारों श्रम संहिताएं श्रमिक हितों को कमजोर करती हैं और श्रम अधिकारों का हनन करती हैं। प्रदर्शनकारियों ने इन कानूनों को काला कानून बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की।
जिलाध्यक्ष मनोज कुमार मिश्र ने कहा कि श्रमिक संगठनों और कर्मचारियों द्वारा लगातार विरोध के बावजूद भी केंद्र सरकार ने इन श्रम कानूनों को मंजूरी दे दी, जो श्रमिकों के भविष्य के लिए घातक है। उन्होंने कहा कि ये कानून पूंजीपति नियोक्ताओं को संरक्षण देने और साधारण श्रमिकों के शोषण को आसान बनाने के लिए बनाए गए हैं। इससे न केवल नौकरी की सुरक्षा खत्म होगी, बल्कि आवाज उठाने और आंदोलन करने के अधिकार भी सीमित हो जाएंगे।
उन्होंने आगे कहा कि नए श्रम कानूनों के तहत हड़ताल, प्रदर्शन, मांगों को लेकर आवाज उठाना और संघ की गतिविधियों को सरकार द्वारा सीमित किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। यदि सरकार जल्द इन कानूनों को वापस नहीं लेती है, तो पूरे देश के लाखों श्रमिक एकजुट होकर बड़ा आंदोलन करेंगे और सरकार को मजबूर करेंगे कि वह श्रमिक विरोधी कानूनों को रद्द करे।
इस विरोध प्रदर्शन में संयुक्त सचिव संजीव कुमार मिश्र, संयुक्त सचिव अनिल कुमार गुप्ता, पारस नाथ अंबे, संघर्ष मंत्री विभूति कुमार, विजय सिंह, प्रमोद सोरेन, पुरण पंडित, अनुपम कुमार सिंह, रिंकू, गणेश, विवेक, अक्षय, मिथिलेश, राहुल, अजित, सदानंद सहित दर्जनों स्वास्थ्य कर्मी शामिल रहे।
प्रदर्शनकारियों ने अस्पताल परिसर में नारेबाजी कर केंद्र सरकार पर श्रमिकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया। कर्मचारियों ने कहा कि चार श्रम संहिताएं—वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, और व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संहिता—श्रमिकों के अधिकारों को सीमित करती हैं। इन कानूनों के लागू होने से नौकरी की सुरक्षा, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा लाभ और संघठन की स्वतंत्रता पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
स्वास्थ्य कर्मियों का कहना था कि सरकार ने श्रमिक संगठनों से बिना चर्चा किए और उनकी आपत्तियों को नज़रअंदाज़ करते हुए यह फैसला लिया है। इसके कारण श्रमिक वर्ग में भारी असंतोष है। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार जल्द ही इन कानूनों को वापस नहीं लेती है, तो संघर्ष को और तेज किया जाएगा। संघ का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ स्वास्थ्य कर्मियों की नहीं, बल्कि देश के हर श्रमिक की लड़ाई है।
संविधान दिवस के मौके पर हुए इस विरोध ने श्रमिक संगठनों के बीच एक बार फिर यह संदेश दिया है कि संविधान में दिए गए अधिकारों की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है, और जब सरकार श्रमिकों के हितों के खिलाफ कदम उठाती है, तो लोकतांत्रिक तरीके से उसका विरोध करना आवश्यक हो जाता है।










