देवघर नगर निगम चुनाव: कांग्रेस में ‘घोषणा’ के बाद भी सस्पेंस, प्रदेश नेतृत्व के फैसले पर सवाल

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देवघर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी को लेकर नया मोड़। प्रदेश नेतृत्व ने आधिकारिक घोषणा की, लेकिन घोषित प्रत्याशी समर्थन लेने को तैयार नहीं। जिला कमेटी दूसरे खेमे के साथ।

 

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देवघर नगर निगम चुनाव: कांग्रेस में ‘घोषणा’ के बाद भी सस्पेंस, प्रदेश नेतृत्व के फैसले पर सवाल

घोषित प्रत्याशी ने समर्थन लेने से बनाई दूरी, जिला कमेटी दूसरे खेमे के साथ खड़ी

Author | Location | Date

राजनीतिक संवाददाता | देवघर | 12 फरवरी 2026

 

देवघर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के भीतर विवाद की स्थिति

 

प्रदेश नेतृत्व की घोषणा के बाद भी कांग्रेस खेमे में एकराय नहीं बन पाई।

देवघर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी को लेकर चल रहा सस्पेंस अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। प्रदेश नेतृत्व द्वारा मेयर पद के लिए आधिकारिक घोषणा किए जाने के बावजूद स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। कारण यह है कि जिसे प्रदेश स्तर से समर्थित प्रत्याशी घोषित किया गया है, वे खुद औपचारिक रूप से कांग्रेस का समर्थन लेने के इच्छुक नहीं दिख रहे हैं।

दूसरी ओर, जिला कांग्रेस कमेटी का बड़ा खेमा उस प्रत्याशी के साथ खड़ा है, जिसे प्रदेश नेतृत्व ने अधिकृत समर्थन नहीं दिया है। इस असमंजस भरी स्थिति ने न सिर्फ कार्यकर्ताओं को दुविधा में डाला है, बल्कि प्रदेश नेतृत्व के फैसले पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

 

प्रदेश की घोषणा, पर ‘स्वीकार’ नहीं

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने मेयर पद के लिए एक चेहरे को आधिकारिक रूप से समर्थित प्रत्याशी घोषित कर दिया है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि घोषित प्रत्याशी ने सार्वजनिक रूप से पार्टी का समर्थन लेने में रुचि नहीं दिखाई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे सामाजिक समीकरण और वोट बैंक की रणनीति हो सकती है। नगर निगम चुनाव में कई प्रत्याशी दलीय छवि से इतर व्यक्तिगत और सामाजिक आधार पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। ऐसे में खुलकर किसी दल का समर्थन लेना कुछ वर्गों के मतों को प्रभावित कर सकता है।

लेकिन इस रणनीति ने कांग्रेस संगठन को असहज स्थिति में डाल दिया है।

 

जिला कमेटी की ‘अलग लाइन’

देवघर जिला कांग्रेस कमेटी के अधिकांश पदाधिकारी उस प्रत्याशी के साथ खड़े बताए जा रहे हैं, जिसे प्रदेश नेतृत्व का औपचारिक समर्थन नहीं मिला है। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का झुकाव भी उसी ओर नजर आ रहा है।

यह स्थिति पार्टी के भीतर दो स्पष्ट खेमों की तस्वीर पेश कर रही है—एक प्रदेश नेतृत्व की लाइन और दूसरा जिला संगठन की पसंद।

कई वरिष्ठ कार्यकर्ता खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं, लेकिन अंदरखाने यह चर्चा तेज है कि यदि संगठन के भीतर ही एकराय नहीं बनी, तो इसका सीधा असर चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

 

फैसले पर उठते सवाल

राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि घोषित प्रत्याशी खुद समर्थन लेने को तैयार नहीं हैं, तो प्रदेश नेतृत्व ने घोषणा किस रणनीति के तहत की?

क्या यह फैसला स्थानीय फीडबैक के बिना लिया गया?

क्या प्रदेश और जिला इकाई के बीच समन्वय की कमी है?

या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब फिलहाल सामने नहीं है, लेकिन यह तय है कि इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर समन्वय पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

 

विपक्ष को मिल सकता है लाभ

देवघर नगर निगम चुनाव में भाजपा, झामुमो और राजद ने अपने-अपने प्रत्याशियों के समर्थन की स्पष्ट रणनीति अपनाई है। संगठन बूथ स्तर तक सक्रिय है और प्रचार अभियान गति पकड़ चुका है।

ऐसे में कांग्रेस के भीतर की यह स्थिति विपक्षी दलों के लिए अवसर बन सकती है। यदि कांग्रेस समर्थक मतदाता ही भ्रम की स्थिति में रहते हैं, तो वोटों का ध्रुवीकरण दूसरे दलों की ओर हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि स्थानीय निकाय चुनावों में संगठनात्मक एकजुटता और स्पष्ट संदेश बेहद अहम होते हैं। किसी भी प्रकार की आंतरिक असहमति मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है।

 

कार्यकर्ताओं में असमंजस

शहर के कई वार्डों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम है कि आखिर पार्टी की आधिकारिक लाइन क्या है। कुछ कार्यकर्ता प्रदेश नेतृत्व के निर्णय को अंतिम मान रहे हैं, तो कुछ जिला कमेटी के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

इस स्थिति में प्रचार अभियान भी प्रभावित हो रहा है। कार्यकर्ताओं को यह स्पष्ट नहीं है कि वे किस नाम को लेकर घर-घर जाएं।

 

आगे क्या?

अब नजर इस बात पर टिकी है कि क्या प्रदेश नेतृत्व और जिला कमेटी के बीच समन्वय स्थापित होगा या यह खींचतान चुनाव तक जारी रहेगी।

यदि घोषित प्रत्याशी औपचारिक रूप से समर्थन स्वीकार करते हैं, तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है। लेकिन यदि दोनों खेमे अपनी-अपनी लाइन पर कायम रहते हैं, तो यह चुनाव कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

फिलहाल देवघर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी को लेकर बना यह घटनाक्रम राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। प्रदेश नेतृत्व के फैसले पर उठते सवाल और जिला इकाई की अलग रणनीति ने चुनावी समीकरण को और रोचक बना दिया है।

प्रमुख बिंदु

प्रदेश नेतृत्व ने एक प्रत्याशी को आधिकारिक समर्थन घोषित किया

घोषित प्रत्याशी समर्थन लेने को इच्छुक नहीं बताए जा रहे

जिला कांग्रेस कमेटी दूसरे प्रत्याशी के साथ खड़ी

संगठनात्मक समन्वय पर उठे सवाल

विपक्षी दलों को संभावित लाभ की चर्चा

 

प्रश्न 1: क्या कांग्रेस ने देवघर में आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किया है?

उत्तर: हां, प्रदेश नेतृत्व द्वारा एक प्रत्याशी को समर्थित घोषित किया गया है।

प्रश्न 2: फिर सस्पेंस क्यों बना हुआ है?

उत्तर: घोषित प्रत्याशी द्वारा समर्थन स्वीकार न करने की चर्चा और जिला कमेटी का अलग रुख सस्पेंस की वजह है।

प्रश्न 3: क्या इसका असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है?

उत्तर: राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, संगठनात्मक असहमति वोटों के बंटवारे का कारण बन सकती है।

प्रश्न 4: आगे क्या संभावनाएं हैं?

उत्तर: यदि जल्द समन्वय स्थापित नहीं हुआ, तो कांग्रेस को चुनाव में नुकसान हो सकता है।

 

निष्कर्ष

देवघर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के भीतर की स्थिति ने प्रदेश नेतृत्व और जिला संगठन के बीच तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घोषित समर्थन और जमीनी रुख के बीच की यह दूरी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। आने वाले दिनों में पार्टी किस तरह इस असमंजस को सुलझाती है, उसी पर उसकी चुनावी दिशा निर्भर करेगी।

 

Disclaimer: यह खबर राजनीतिक घटनाक्रम और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। आधिकारिक बयान आने पर स्थिति में परिवर्तन संभव है।

Baba Wani
Author: Baba Wani

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