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देवघर नगर निगम में जोनल समिति गठन प्रक्रिया पर विवाद गहराया। वार्ड पार्षद ने नगर आयुक्त से प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की, अनियमितता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए।
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देवघर नगर निगम की जोनल समिति गठन प्रक्रिया पर विवाद, पार्षद ने लगाई रोक की मांग
चयन प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप, पारदर्शिता और नियमों के पालन को लेकर उठे गंभीर सवाल
संवाददाता | देवघर | 28 अप्रैल 2026

देवघर नगर निगम के वार्ड नंबर 30 के पार्षद गोपी कुमार गुप्ता और जोनल समिति गठन विवाद
जोनल समिति गठन प्रक्रिया को लेकर देवघर नगर निगम में बढ़ा विवाद
क्या है पूरा मामला?
देवघर नगर निगम में जोनल (क्षेत्रीय) समिति, स्थायी समिति और जिला योजना समिति के गठन को लेकर एक नया प्रशासनिक विवाद सामने आया है। वार्ड संख्या 30 के पार्षद गोपी कुमार गुप्ता ने नगर आयुक्त को एक विस्तृत तीन पृष्ठीय पत्र सौंपकर इस पूरी प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
पार्षद ने आरोप लगाया है कि नगर निगम प्रशासन द्वारा जारी पत्र संख्या 602 (दिनांक 18 अप्रैल 2026) के तहत जो कार्रवाई की जा रही है, वह झारखंड नगरपालिका अधिनियम, 2011 के प्रावधानों के विपरीत है। उन्होंने इसे नियमों की अनदेखी और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया है।
कानून के उल्लंघन का आरोप
पार्षद गोपी कुमार गुप्ता ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि जोनल समिति गठन की प्रक्रिया अधिनियम की धारा 49(1) के अनुरूप नहीं अपनाई गई।
उनका कहना है कि:
सरकार स्तर से वार्ड समूह निर्धारण की अधिसूचना जारी नहीं हुई
इसके बावजूद समिति गठन और सदस्य चयन के लिए बैठक बुला ली गई
यह प्रक्रिया पूरी तरह विधिक प्रावधानों के खिलाफ है
उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह नियमों को दरकिनार कर निर्णय लिए जाएंगे, तो भविष्य में यह बड़ा कानूनी विवाद बन सकता है।
महापौर के अधिकार क्षेत्र का मुद्दा
विवाद का एक अहम पहलू महापौर के अधिकार क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है।
पार्षद ने अधिनियम की धारा 24(3) का हवाला देते हुए कहा कि:
जोनल समितियों के पीठासीन पदाधिकारी के रूप में महापौर को अधिकृत किया गया है
इसके बावजूद नगर आयुक्त स्तर से बैठक बुलाना अधिकार क्षेत्र से बाहर की कार्रवाई है
उन्होंने आरोप लगाया कि 24 अप्रैल 2026 को नगर निगम सभागार में आयोजित बैठक में महापौर की भूमिका को नजरअंदाज किया गया, जो प्रशासनिक संतुलन के खिलाफ है।
बैठक की पारदर्शिता पर उठे सवाल
पार्षद ने 24 अप्रैल को आयोजित बैठक की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि:
बैठक का एजेंडा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया
चयन/चुनाव प्रक्रिया विधिसम्मत तरीके से नहीं कराई गई
बैठक की कार्यवाही अब तक पार्षदों को उपलब्ध नहीं कराई गई
पारित निर्णयों की आधिकारिक सूचना भी जारी नहीं हुई
सबसे गंभीर आरोप यह है कि बैठक में कुछ ऐसे सदस्यों की उपस्थिति दर्ज की गई, जो वास्तव में मौजूद ही नहीं थे।
पार्षद ने इस मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए:नगर निगम परिसर के CCTV फुटेज की जांच
बैठक की वीडियो रिकॉर्डिंग का सत्यापन
कराने की मांग की है।
“पहले सरकार से अनुमोदन, फिर गठन”
गोपी कुमार गुप्ता ने अपने पत्र में सुझाव दिया है कि:
पहले नगर विकास विभाग, झारखंड सरकार को वार्ड समूह निर्धारण का प्रस्ताव भेजा जाए
विभागीय स्वीकृति मिलने के बाद ही समिति गठन प्रक्रिया शुरू हो
उन्होंने कहा कि यह कदम न केवल कानून के अनुरूप होगा बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता को भी मजबूत करेगा।
न्यायालय जाने की चेतावनी
पार्षद ने नगर आयुक्त को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा है कि:
यदि पत्र संख्या 602 के तहत जारी प्रक्रिया पर तुरंत रोक नहीं लगाई जाती, तो वे न्याय प्राप्ति के लिए सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि वे नगर निगम की कार्यप्रणाली को पारदर्शी और जवाबदेह बनाए रखें।
कई अधिकारियों को भेजी गई प्रतिलिपि
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए पार्षद ने अपने पत्र की प्रतिलिपि कई उच्च अधिकारियों को भी भेजी है, जिनमें शामिल हैं:
उपायुक्त-सह-जिला दंडाधिकारी, देवघर
प्रमंडलीय आयुक्त, दुमका
नगर विकास एवं आवास विभाग के सचिव
झारखंड सरकार के मुख्य सचिव
मुख्यमंत्री कार्यालय
प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
क्यों बढ़ सकता है विवाद?
नगर निगम की इस प्रक्रिया पर उठे सवाल अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दे का रूप ले सकते हैं।
संभावनाएं हैं कि:
अन्य पार्षद भी इस मुद्दे पर खुलकर विरोध कर सकते हैं
मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो सकती है
नगर निगम की कार्यप्रणाली पर व्यापक बहस छिड़ सकती है
यदि आरोपों की जांच होती है, तो इससे कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं, जो नगर प्रशासन की पारदर्शिता पर सीधा असर डालेंगे।
प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी नजरें
फिलहाल इस पूरे मामले में नगर निगम प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि:
क्या नगर आयुक्त इस प्रक्रिया पर रोक लगाएंगे
या फिर जांच के आदेश दिए जाएंगे
यह निर्णय आने वाले दिनों में नगर निगम की विश्वसनीयता और प्रशासनिक छवि को प्रभावित कर सकता है।
निष्कर्ष
देवघर नगर निगम में जोनल समिति गठन को लेकर उठे सवाल केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि पारदर्शिता, अधिकारों के संतुलन और विधिक प्रक्रिया की परीक्षा भी हैं।
यदि समय रहते इस मामले का निष्पक्ष समाधान नहीं हुआ, तो यह न केवल कानूनी विवाद का रूप ले सकता है, बल्कि नगर प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर सकता है।
Q1. जोनल समिति क्या होती है?
A. जोनल समिति नगर निगम के विभिन्न क्षेत्रों (जोन) के प्रशासन और विकास कार्यों की निगरानी के लिए बनाई जाती है।
Q2. विवाद का मुख्य कारण क्या है?
A. समिति गठन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी, पारदर्शिता की कमी और अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल इस विवाद की मुख्य वजह हैं।
Q3. पार्षद ने क्या मांग की है?
A. पार्षद ने पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाने और विधिसम्मत तरीके से पुनः गठन करने की मांग की है।
Q4. क्या मामला कोर्ट तक जा सकता है?
A. हाँ, पार्षद ने स्पष्ट कहा है कि यदि रोक नहीं लगाई गई तो वे न्यायालय का रुख करेंगे।
Q5. आगे क्या हो सकता है?
A. संभव है कि प्रशासन जांच के आदेश दे या प्रक्रिया को पुनः शुरू करे।










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