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झारखंड आंदोलन के अग्रदूत दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान मिलने पर देवघर समेत पूरे झारखंड में खुशी की लहर। झामुमो नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने भारत रत्न देने की मांग उठाई।
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दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, झारखंड में जश्न का माहौल
झामुमो नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने कहा- यह पूरे झारखंड के संघर्ष और सम्मान की जीत, भारत रत्न देने की भी उठी मांग
News Desk | Deoghar | 23 June 2026

पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित झारखंड आंदोलन के अग्रदूत दिशोम गुरु शिबू सोरेन
राष्ट्रपति भवन में मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान प्राप्त करते दिशोम गुरु शिबू सोरेन के परिवार का प्रतिनिधित्व करतीं रूपी सोरेन।
झारखंड आंदोलन के महानायक, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक, पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी समाज के सशक्त स्वर रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किए जाने पर पूरे झारखंड में खुशी और गौरव का माहौल है। मंगलवार को आयोजित सम्मान समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनकी धर्मपत्नी रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया। इस ऐतिहासिक क्षण को झारखंड के लोगों ने अपने लंबे सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की मान्यता के रूप में देखा।
देवघर में भी इस सम्मान को लेकर झामुमो नेताओं, जनप्रतिनिधियों और समर्थकों ने प्रसन्नता व्यक्त की। नेताओं ने कहा कि शिबू सोरेन का जीवन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि वह झारखंड की पहचान, आदिवासी अस्मिता और सामाजिक न्याय के संघर्ष का पर्याय थे। कई नेताओं ने एक स्वर में मांग उठाई कि उनके ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया जाना चाहिए।
झारखंड आंदोलन की पहचान थे दिशोम गुरु
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम झारखंड आंदोलन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने ऐसे समय में आदिवासियों, गरीबों और वंचित वर्गों की आवाज बुलंद की, जब उनकी समस्याओं को मुख्यधारा की राजनीति में पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा था। जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की लड़ाई को जनआंदोलन का रूप देने में उनकी भूमिका निर्णायक रही।
झारखंड राज्य के गठन के पीछे जिन नेताओं का सबसे बड़ा योगदान माना जाता है, उनमें शिबू सोरेन का नाम सबसे प्रमुख है। उन्होंने दशकों तक आंदोलन का नेतृत्व किया और अलग राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया। यही कारण है कि आज भी लाखों लोग उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि “दिशोम गुरु” के रूप में सम्मान देते हैं।
संजय शर्मा बोले- यह पूरे झारखंड का सम्मान
झामुमो जिला अध्यक्ष संजय शर्मा ने पद्म भूषण सम्मान पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के संघर्ष, स्वाभिमान और पहचान का सम्मान है।
उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन ने अपना पूरा जीवन आदिवासी समाज, किसानों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों की लड़ाई में समर्पित कर दिया। उनके संघर्षों के कारण ही झारखंड को अपनी अलग पहचान मिली। पद्म भूषण सम्मान उनके योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति है।
परिमल सिंह ने कहा- झारखंड की आत्मा थे गुरुजी
झामुमो केंद्रीय समिति सदस्य परिमल सिंह ने कहा कि दिशोम गुरु केवल राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं थे, बल्कि झारखंड की आत्मा और जनभावनाओं के प्रतीक थे।
उन्होंने कहा कि समाज के वंचित वर्गों को अधिकार दिलाने और लोकतांत्रिक संघर्ष को नई दिशा देने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही है। आज पूरा राज्य इस सम्मान को अपने सम्मान के रूप में देख रहा है।
महापौर रवि कुमार राउत ने भारत रत्न की मांग उठाई
देवघर के महापौर रवि कुमार राउत ने कहा कि पद्म भूषण सम्मान मिलने से पूरे राज्य का गौरव बढ़ा है। उन्होंने कहा कि महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष, आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रसार, सामाजिक जागरूकता और झारखंड आंदोलन में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा कि गुरुजी का जीवन संघर्ष और जनसेवा की मिसाल है। ऐसे महान व्यक्तित्व को भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका योगदान केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है।

दिशुम गुरु शिबू सोरेन मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित
उपमहापौर टिप चटर्जी ने कहा- राष्ट्र की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि
उपमहापौर टिप चटर्जी ने कहा कि दिशोम गुरु ने झारखंड की अस्मिता को नई पहचान दिलाई। उन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और अधिकार पहुंचाने की लड़ाई लड़ी।
उन्होंने कहा कि पद्म भूषण सम्मान वास्तव में राष्ट्र की ओर से उन्हें दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है।
अन्य नेताओं ने भी जताया हर्ष
झामुमो नेता प्रदीप चौधरी ने कहा कि शिबू सोरेन ने हमेशा गरीबों, किसानों और मजदूरों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनका पूरा जीवन संघर्ष और सेवा के लिए समर्पित रहा।
अजय नारायण मिश्रा ने कहा कि झारखंड के इतिहास की कोई भी चर्चा दिशोम गुरु के बिना पूरी नहीं हो सकती। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
नंदू दास ने कहा कि गुरुजी ने समाज के कमजोर वर्गों को सम्मान और अधिकार दिलाने का कार्य किया। उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी।
सुरेश शाह ने कहा कि पद्म भूषण सम्मान पूरे झारखंड के लिए गर्व और सम्मान का विषय है। यह सम्मान राज्य के संघर्षशील इतिहास की पहचान है।
मनोज दास ने कहा कि दिशोम गुरु ने जनआंदोलन को नई ऊर्जा दी और हमेशा जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष किया।
राहुल चंद्रवंशी ने कहा कि उनका जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और उनके आदर्श हमेशा समाज को दिशा देते रहेंगे।
राष्ट्रपति और केंद्र सरकार के प्रति जताया आभार
झामुमो नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तथा केंद्र सरकार के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस सम्मान से झारखंड के करोड़ों लोगों की भावनाओं को सम्मान मिला है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन सभी लोगों के संघर्ष को भी समर्पित है जिन्होंने झारखंड आंदोलन में अपना योगदान दिया।
निष्कर्ष
दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान मिलना केवल एक राष्ट्रीय सम्मान नहीं, बल्कि झारखंड के इतिहास, संघर्ष और पहचान को मिली बड़ी मान्यता है। झारखंड आंदोलन से लेकर आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई तक, उनका योगदान राज्य की सामूहिक स्मृति का अभिन्न हिस्सा है। यही कारण है कि आज पूरा झारखंड इस उपलब्धि को गर्व और सम्मान के साथ मना रहा है तथा उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग भी तेज होती जा रही है।
Q1. शिबू सोरेन को कौन सा सम्मान मिला है?
A. शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया है।
Q2. यह सम्मान किसने ग्रहण किया?
A. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से यह सम्मान उनकी धर्मपत्नी रूपी सोरेन ने ग्रहण किया।
Q3. शिबू सोरेन को यह सम्मान क्यों दिया गया?
A. आदिवासी समाज, झारखंड आंदोलन और सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे एवं महत्वपूर्ण योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है।
Q4. नेताओं ने क्या मांग की है?
A. झामुमो नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने शिबू सोरेन को भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग उठाई है।
Q5. झारखंड आंदोलन में शिबू सोरेन की क्या भूमिका रही?
A. वे झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे और अलग झारखंड राज्य के गठन के लिए लंबे समय तक संघर्ष करते रहे।










